बर्फमानव की वापसी

बर्फ मानव की वापसी एक नेटिव अमेरिकन चेरोकी लोक कथा है। दावानल से लोगों को बचाने के लिए कैसे एक बर्फ का मानव वापस आता है ।

लोक कथा

Cherokee folktale by Sushma jee

12/22/20251 मिनट पढ़ें

white concrete building during daytime
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एक बार की बात है कि पतझड़ के मौसम में एक बहुत सारे कोहरे वाले पहाड़ पर पड़ी सूखी पत्तियों ने आग पकड़ ली और वे धू धू कर के जल उठीं। आग फैलती गयी और फैलती गयी। कोई उस आग को काबू में नहीं कर सका।

उस भयंकर आग से बहुत सारे पेड़ जल गये, फिर वह उनकी जड़ों में चली गयी और वहाँ भी उसने बहुत सारे गड्ढे कर दिये। आग और गहरे में घुस गयी और वहाँ धरती की हर चीज़ को जलाती गयी। धीरे धीरे वहाँ एक बहुत बड़ा गड्ढा बन गया।

जब यह आग इतनी अधिक बढ़ गयी तो वहाँ के रहने वाले लोग परेशान हो गये। उन्होंने इस बीच में आग बुझाने की बहुत कोशिश की परन्तु नाकामयाब रहे।

तब गाँव का सरदार बोला कि केवल एक ही आदमी उस आग को बुझा सकता था और वह था बर्फ का आदमी। वह बर्फ का आदमी बहुत दूर कहीं उत्तर में रहता था।

सरदार ने फिर एक मीटिंग बुलायी और इकठ्ठा हुए आदमियों में से दो आदमियों को चुना जो बर्फ के आदमी की खोज में जा सकें और उसको वहाँ ला सकें। सो वे दो आदमी उत्तर की तरफ गये। काफी लम्बा सफर करने के बाद उन लोगों को वह बर्फ का आदमी मिल गया।

बर्फ का आदमी बहुत बूढ़ा था। उसके धरती तक लम्बे बाल दो लम्बी चोटियों में बँधे लटके हुए थे। उन दोनों आदमियों ने बर्फ के आदमी को अपने आने की वजह बतायी और कहा कि वे आग बुझाने में उसकी मदद चाहते हैं।

बर्फ का आदमी बोला — “हाँ, मैं आग बुझाने में तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।”

कह कर उसने अपने बाल खोल डाले। फिर उनमें से उसने अपने बालों की एक लट ली और उसको दूसरे हाथ की हथेली पर मारा। इससे बहुत ठंडी हवा चलने लगी।

जब उसने उसी लट को हथेली पर दोबारा मारा तो धीमी धीमी बारिश होने लगी। और जब तीसरी बार उसने उस लट को हथेली पर मारा तो बारिश बहुत तेज़ हो गयी।

और जब चौथी बार उसने अपनी लट को हथेली पर मारा तो बहुत ज़ोर से बर्फ गिरने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे यह सब उसकी उस लट में से निकल रहा हो।

वह बर्फ का आदमी उन दोनों आदमियों से बोला — “अब तुम लोग घर वापस जाओ मैं भी कुछ दिनों में वहाँ आता हूँ।”

वे दोनों आदमी उसका यह सन्देश ले कर तुरन्त अपने गाँव वापस आ गये। वहाँ लोग अभी भी जलते हुए गड्ढे के चारों तरफ मजबूर से खड़े हुए थे।

कुछ ही दिनों में उत्तरी ठंडी हवा बहने लगी। लोगों ने जान लिया कि वह हवा बर्फ के आदमी की भेजी हुई थी। परन्तु उस हवा से तो आग और भी तेज़ हो गयी थी।

इतने में धीमी धीमी बारिश शुरू हो गयी लेकिन वहाँ आग इतनी तेज़ थी कि उस आग पर उस बारिश का कोई असर ही नहीं हो रहा था।

फिर वह धीमी बारिश तेज़ बारिश में बदल गयी जिसने आग तो कम की परन्तु उस बारिश के आग पर पड़ने से जो धुआँ उठा उससे बादल बन गये।

सारे लोग बारिश से बचने के लिये अपने अपने घर की तरफ दौड़े। इतने में ही बहुत ज़ोर का तूफान आ गया और उसके साथ आयी बर्फ जिसने सारी आग को सफेद बर्फ से ढक दिया। ऐसा लग रहा था जैसे आग के ऊपर किसी ने सफेद बर्फ का कम्बल डाल दिया हो।

काफी दिनों के बाद जब यह तूफान रुका और लोग अपने अपने घरों से बाहर निकले तो उन्होंने देखा कि वह जलता हुआ गड्ढा अब एक बड़ी झील बन गया है।

आज भी उस बहुत सारे कोहरे वाले पहाड़ के पास रहने वाले लोगों का कहना है कि वे अभी भी कभी कभी झील में पानी के नीचे अंगारे बुझने की आवाजें सुनते हैं।

(चेरोकी जनजाति की लोककथा )

(साभार सुषमा गुप्ता जी)