सुषमा गुप्ता जी : एक प्रेरणादायक परिचय

सुषमा गुप्ता जी, भारतीय ज्ञान परंपरा की वाहक हैं। विदुषी और साहित्य सेवा करने वाली मौन साधिका। प्रस्तुत लेख में उनका एक बहुत ही संक्षिप्त और साधारण परिचय है ।

जीवनी / BIOGRAPHY

Storykars

12/22/20251 मिनट पढ़ें

सुषमा गुप्ता जी का जीवन एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचने की प्रेरक कथा है। उनका जन्म सन 1938 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के छोटे-से कस्बे झालू में हुआ। उस समय यह कस्बा शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और अन्य बुनियादी सुविधाओं से लगभग वंचित था। न बिजली थी, न पक्की सड़कें, न उच्च शिक्षा की व्यवस्था और न ही जीवन या करियर के लिए कोई मार्गदर्शन। ऐसे माहौल में जीवन का रास्ता बनाना आसान नहीं था। जो कुछ भी हासिल करना था, वह अपने आत्मबल और परिश्रम से ही करना पड़ता था।

सुषमा गुप्ता जी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई अत्यंत कठिन परिस्थितियों में पूरी की। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई उन्होंने अपनी नानी के यहाँ रहकर की, जहाँ सुविधाएँ थोड़ी बेहतर थीं, पर परिस्थितियाँ फिर भी संघर्षपूर्ण थीं। आज वे स्वयं आश्चर्य करती हैं कि इतने सीमित संसाधनों के बावजूद वे आगे की पढ़ाई के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) तक कैसे पहुँचीं और विज्ञान जैसे कठिन विषयों का चयन कैसे किया।

उन्हीं के शब्दों में "लगता है कि जैसे जीवन के कई महत्त्वपूर्ण निर्णय किसी अदृश्य शक्ति या नियति ने मेरे लिए तय किए हों।"

उन्होंने BHU से बी.एससी. और एम.एससी. (भू-भौतिकी) की शिक्षा प्राप्त की और इसके बाद तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग (ONGC) में भू-भौतिकविद् के रूप में कार्य किया। बाद में वे वैज्ञानिक अधिकारी (डॉक्यूमेंटेशन) के रूप में भी कार्यरत रहीं। ज्ञान, सूचना और दस्तावेज़ीकरण के क्षेत्र में उनकी गहरी रुचि ने उन्हें आगे चलकर पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान की ओर मोड़ा। उन्होंने भारत, नाइजीरिया और अमेरिका से इस विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त की और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक कुशल पुस्तकालयाध्यक्ष और दस्तावेज़ विशेषज्ञ के रूप में अपनी पहचान बनाई।

सुषमा गुप्ता जी का कार्य-जीवन भारत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने नाइजीरिया, इथियोपिया, लेसोथो, अमेरिका और कनाडा जैसे अनेक देशों में लंबे समय तक काम किया। नाइजीरिया और इथियोपिया के विश्वविद्यालयों में उन्होंने कई वर्षों तक पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में सेवा दी। इसके बाद अमेरिका में वेन स्टेट यूनिवर्सिटी और ऑटोमोटिव इंडस्ट्री एक्शन ग्रुप जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया। इन सभी स्थानों पर उन्होंने पुस्तकालयों का संगठन, कैटलॉगिंग, डाटाबेस निर्माण, शोध सहायता और अभिलेखागार प्रबंधन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य किए।

इन विभिन्न देशों में रहते और काम करते हुए उन्हें अलग-अलग संस्कृतियों, समुदायों और जीवन-शैलियों को बहुत निकट से देखने-समझने का अवसर मिला। यही अनुभव उनके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बने। उन्होंने महसूस किया कि सामाजिक संबंध (Social Capital), आपसी विश्वास, मानवीय रिश्ते और आध्यात्मिक समझ (Spiritual Capital) किसी भी समाज को मजबूत बनाते हैं। उनके विचारों में आध्यात्मिकता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मनुष्यता, करुणा और सह-अस्तित्व का भाव है।

सेवानिवृत्ति के बाद सुषमा गुप्ता जी ने अपने इन समृद्ध अनुभवों को लेखन और अनुवाद के माध्यम से समाज के साथ बाँटने का निर्णय लिया। सन 2010 से उन्होंने अंतरराष्ट्रीय लोककथाओं का अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद आरंभ किया। अब तक वे 2500 से अधिक लोककथाओं का अनुवाद कर चुकी हैं, जिन्हें 150 से अधिक पुस्तकों के रूप में संकलित किया गया है। नाइजीरिया, इथियोपिया, बंगाल, रैवेन तथा अन्य देशों की लोककथाओं को हिन्दी में प्रस्तुत कर उन्होंने भारतीय पाठकों को विश्व की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा है। उनकी कुछ पुस्तकें ब्रेल लिपि में भी प्रकाशित हुई हैं, जो उनके सामाजिक सरोकार और संवेदनशील दृष्टि को दर्शाती हैं।

सुषमा गुप्ता जी के नाम 35 से अधिक शोध लेख, कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकें, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सहभागिता और प्रतिष्ठित सम्मान दर्ज हैं। वे हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में दक्ष हैं और आज भी सक्रिय रूप से लेखन एवं अनुवाद कार्य कर रही हैं। वर्तमान में वे कनाडा में रह रही हैं और वहाँ से भी भारतीय भाषा, संस्कृति और वैश्विक लोकपरंपराओं के संरक्षण में योगदान दे रही हैं।भारतीय संस्कृति की एक अप्रतिम पुरोधा के रूप में अपना सेवादान देते हुए वे sanskriti and sanskaar नाम से ब्लॉग भी लिखती हैं।  उनके स्वर्णिम कैरियर और जीवन वृत्त के विषय में आप उनकी ही अपनी वेबसाईट www.sushmajee.com से जान सकते हैं। 

सुषमा गुप्ता जी का कार्यक्षेत्र इतना विस्तृत और व्यक्तित्व इतना बहुआयामी है कि शायद एक लेख में उनके विषय में कुछ लिखना - समुद्र को बाल्टी में भरने जैसा कार्य होगा। उन्ही के शब्दों में -"I am not a feminist, I am a humanist."

हमारे देश की असंख्य ऐसी प्रतिभाएं जिन्होंने मौन रहते हुए समाज को निस्पृह भाव से जीवन भर सार्थक योगदान दिया, सुषमा जी उसका उदाहरण हैं।

ऐसी महान ऋषितुल्य कर्मयोगी को स्टोरीकर्स टीम सादर प्रणाम करती है।