निदा फाजली की कविता: शांति की आकांक्षा

निदा फाजली की यह कविता प्राकृतिक शुद्धिकरण और क्षत-विक्षत विश्व की मरम्मत का कोमल आह्वान है। इसमें साहित्यिक संवेदना के माध्यम से शांति की त्रासदीपूर्ण आकांक्षा को दर्शाया गया है।

POEMS/कविता

निदा फाजली

1/29/20261 मिनट पढ़ें

worm's-eye view photography of concrete building
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जितनी बुरी कही जाती है
उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के स्कूल में शायद
तुमसे मिली नहीं है दुनिया

चार घरों के एक मुहल्ले
के बाहर भी है आबादी
जैसी तुम्हें दिखाई दी है
सबकी वही नहीं है दुनिया

घर में ही मत इसे सजाओ,
इधर-उधर भी ले के जाओ
यूँ लगता है जैसे तुमसे
अब तक खुली नहीं है दुनिया

भाग रही है गेंद के पीछे
जाग रही है चाँद के नीचे
शोर भरे काले नारों से
अब तक डरी नहीं है दुनिया