मृत्यु का भय और विनाशकारी प्रभाव

यह कविता-खंड मृत्यु के भयांतक द्वंद्व और उसके विनाशकारी फैलाव को उद्घाटित करता है। यह केवल व्यक्तिगत मृत्यु नहीं, बल्कि परिजनों के हृदय और भावनाओं का संपूर्ण विनाश दर्शाता है।

POEMS/कविता

अपूर्णा

1/27/20261 मिनट पढ़ें

black blue and yellow textile
black blue and yellow textile

मृत्यु से पूर्व उसकी आँखों में भय था,

क्या वह मृत्यु का भय था अथवा

मृत्यु से पूव होने वाली नृशंसता का भय था

अथवा मृत्यु का ही भय था

कि उसकी मृत्यु उसके परिजनों की मृत्यु में परिणित हो जाएगी ।

ऐसा निश्चित होगा

क्योंकि मरने वाला कभी अकेला नहीं मरता

वह मारता है किसी न किसी को

या किसी के अन्तः को

या किसी की भावनाओं को ।

पर इस मृत्यु ने किसे मारा ?

अपने उनको, जिनको वह जीवित रखना चाहता था ।

मृत्यु किसी को मारने के लिए ही आती है

पर वह एक साथ कइयों को कुचलती है,

कइयों के हृदय व मस्तिष्क को खा जाती है,

मृत्यु खा जाती है एक व्यक्ति के साथ बहुत कुछ ॥