दिल की दिल को ख़बर नहीं मिलती

सहर की धूप तो आती है पर नसीम-ए-सहर ग़ायब, मासूम दिल की पहली चोट दोस्तों से नज़रें चुरा लेती है। जुनून के मक़ाम पर होश की राह भटक जाती है, और बिना इंसानी आह वाले फ़ुग़ाँ पर मुल्ला का असर न होता।

कविता

आनंद नारायण मुल्ला

1/12/20261 मिनट पढ़ें

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दिल की दिल को ख़बर नहीं मिलती
जब नज़र से नज़र नहीं मिलती

सहर आई है दिन की धूप लिए
अब नसीम-ए-सहर नहीं मिलती

दिल-ए-मासूम की वो पहली चोट
दोस्तों से नज़र नहीं मिलती

जितने लब उतने उस के अफ़साने
ख़बर-ए-मोतबर नहीं मिलती

है मक़ाम-ए-जुनूँ से होश की रह
सब को ये रह-गुज़र नहीं मिलती

नहीं 'मुल्ला' पे उस फ़ुग़ाँ का असर
जिस में आह-ए-बशर नहीं मिलती