अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ : एक परिचय
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ : जीवन और साहित्यिक योगदान
जीवनी / BIOGRAPHY
Storykars
12/19/20251 मिनट पढ़ें


अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (15 अप्रैल, 1865 – 16 मार्च, 1947) आधुनिक हिंदी साहित्य के उन महान स्तंभों में से एक हैं,
जिन्होंने हिंदी को न केवल समृद्ध किया, बल्कि उसे नई पहचान भी दी। वे कवि, निबंधकार, उपन्यासकार, नाटककार, आलोचक, अनुवादक और संपादक—सभी रूपों में समान रूप से समर्थ थे। हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय मुख्यतः उन्हीं को जाता है।
जन्म, परिवार और प्रारंभिक वातावरण
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म 15 अप्रैल, 1865 ई. को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद नामक कस्बे में हुआ। उनके पिता पंडित भोलानाथ उपाध्याय एक विद्वान, धार्मिक और संस्कारशील व्यक्ति थे। परिवार में विद्या और अनुशासन का वातावरण था, जिसने हरिऔध जी के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाल्यकाल से ही उनमें अध्ययनशीलता, गंभीरता और भाषा के प्रति विशेष रुचि दिखाई देने लगी थी। घर का वातावरण ऐसा था जहाँ संस्कृत, धर्मग्रंथों और शास्त्रों का सम्मान किया जाता था।
शिक्षा और भाषागत ज्ञान
हरिऔध जी की प्रारंभिक शिक्षा निजामाबाद एवं आजमगढ़ में हुई। मात्र पाँच वर्ष की आयु में उनके चाचा ने उन्हें फ़ारसी भाषा पढ़ानी शुरू कर दी। इसके बाद उन्होंने क्रमशः— संस्कृत,उर्दू,फ़ारसी,बांग्ला,अंग्रेज़ी भाषाओं और उनके साहित्य का गहन अध्ययन किया।
मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे काशी के क्वींस कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़ने गए, किंतु स्वास्थ्य खराब होने के कारण पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने घर पर रहकर स्वाध्याय द्वारा भाषाओं और साहित्य का ज्ञान अर्जित किया। यही स्वाध्याय आगे चलकर उनके साहित्यिक वैभव का आधार बना।
विवाह एवं पारिवारिक जीवन
सन 1884 ई. में उनका विवाह निर्मला कुमारी से हुआ। उनका पारिवारिक जीवन अत्यंत सादा, संयमित और साहित्य-केन्द्रित रहा। वे गृहस्थ जीवन के दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी साहित्य-साधना में पूर्णतः रत रहे।
आजीविका एवं कार्य-जीवन
सन 1889 ई. में हरिऔध जी को सरकारी नौकरी मिली और वे कानूनगो नियुक्त हुए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ निरंतर साहित्य-रचना की।
सन 1932 ई. में वे सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए। इसके पश्चात उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अवैतनिक प्राध्यापक के रूप में कई वर्षों तक अध्यापन किया। वे लगभग 1941 ई. तक इस पद पर कार्यरत रहे।
काशी जैसे विद्या-केंद्र में रहकर उनका साहित्यिक व्यक्तित्व और अधिक परिपक्व हुआ। इसके बाद वे निजामाबाद लौट आए और जीवन के अंतिम वर्षों तक वहीं रहकर साहित्य-साधना करते रहे।
साहित्यिक विकास और युगीन योगदान
हरिऔध जी का साहित्यिक जीवन हिंदी के तीन युगों को स्पर्श करता है—
भारतेंदु युग
द्विवेदी युग
छायावादी युग
परंतु उनका वास्तविक उत्कर्ष द्विवेदी युग में हुआ। वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के विचारों से प्रभावित थे, किंतु उनकी कविता केवल उपदेशात्मक नहीं, बल्कि भावात्मक और कलात्मक भी है।
खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य : ‘प्रिय प्रवास’
हरिऔध जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ‘प्रिय प्रवास’ (1914 ई.) है। यह खड़ी बोली हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।
विशेषताएँ—
कुल 17 सर्ग
श्रीकृष्ण के बाल्यकाल से मथुरा गमन तक की कथा
वियोग, करुणा और वात्सल्य का मार्मिक चित्रण
कृष्ण को ईश्वर नहीं, बल्कि लोक-सेवक आदर्श मानव के रूप में चित्रित किया गया है
इसे मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ
इस ग्रंथ को हिंदी साहित्य में “मील का पत्थर” कहा जाता है।
अन्य प्रमुख काव्य-कृतियाँ
वैदेही वनवास (1940 ई.)-रामकथा पर आधारित, सीता के वनवास का करुण चित्रण,18 सर्ग,करुण रस की प्रधानता,सरल, लोक-भाषा का प्रयोग
पारिजात (1937 ई.)- 15 सर्ग,विविध विषयों की कविताओं का संग्रह,संस्कृतनिष्ठ शैली
रस कलश - रीतिकालीन अलंकरण शैली,काव्य-शिल्प की उत्कृष्टता
चोखे चौपदे एवं चुभते चौपदे- उर्दू-हिंदी की मुहावरेदार शैली,सामाजिक यथार्थ का चित्रण
गद्य-साहित्य में योगदान
हरिऔध जी केवल कवि ही नहीं, अपितु श्रेष्ठ गद्यकार भी थे।
उपन्यास- ठेठ हिंदी का ठाठ, अधखिला फूल
नाटक-रुक्मिणी परिणय, प्रद्युम्न विजय व्यायोग
आलोचना एवं निबंध- हिंदी भाषा और साहित्य का विकास, विभूतिमती ब्रजभाषा
इन रचनाओं में उनकी भाषा-चेतना और साहित्यिक दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है।
बाल साहित्य- हरिऔध जी बालकों के मानसिक विकास को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने बाल विलास, बाल विभव, चंद्र खिलौना, बाल गीतावली, फूल-पत्ते जैसी रचनाएँ लिखीं, जो बाल साहित्य में अमूल्य योगदान हैं।
भाषा और शैली
हरिऔध जी ने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों का प्रयोग किया।
भाषा की विशेषताएँ—
संस्कृत-गर्भित शब्दावली
उर्दू-फारसी शब्दों का संतुलित प्रयोग
प्रौढ़, प्रांजल और प्रभावशाली भाषा
कहीं-कहीं अत्यधिक तत्सम प्रयोग
वे सरल और कठिन—दोनों प्रकार की भाषा पर समान अधिकार रखते थे।
रस, छंद और अलंकार
रस— करुण, वियोग, शृंगार, वात्सल्य
छंद—कवित्त, दोहा, छप्पय, इंद्रवज्रा, शिखरिणी, मालिनी, मंदाक्रांता, शार्दूल विक्रीड़ित
अलंकार—उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास,यमक
उनकी कविता अलंकारों से सजी हुई है, पर बोझिल नहीं।
सम्मान और प्रतिष्ठा
दो बार हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति
विद्यावाचस्पति की उपाधि
‘प्रिय प्रवास’ के लिए मंगलाप्रसाद पारितोषिक
निधन
16 मार्च, 1947 ई. को 76 वर्ष की आयु में निजामाबाद (आजमगढ़) में उनका निधन हुआ।
हिंदी साहित्य में स्थान और विरासत
हरिऔध जी हिंदी के सार्वभौम कवि माने जाते हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि खड़ी बोली भी ब्रजभाषा की भाँति मधुर, सरस और भावपूर्ण हो सकती है। उनका योगदान हिंदी कविता के इतिहास में अमर है।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के शब्दों में—
“हरिऔध हिंदी के सार्वभौम कवि हैं।”


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